
हाल ही में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने झारखंड सरकार के दो मंत्रियों, माननीय हफीजुल हसन और माननीय इरफान अंसारी, पर महाकुंभ को लेकर भ्रामक बयान देने और माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और झारखंड पुलिस से इन मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी की है। बाबूलाल मरांडी के इस बयान से उनकी संकीर्ण मानसिकता और घटिया राजनीतिक मंशा स्पष्ट रूप से जाहिर करता है।
महाकुंभ मेला केवल हिंदुओं का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक, आध्यात्मिक उत्सव है बल्कि राष्ट्रीय आयोजन । इस आयोजन से हर नागरिक जुड़ा हुआ है, भले ही उसकी धार्मिक आस्था किसी भी धर्म से हो। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब यही रही है कि हर धर्म और संप्रदाय के लोग एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों का सम्मान करते आए हैं। ऐसे में बाबूलाल मरांडी का यह कहना कि महाकुंभ पर सवाल उठाने का अधिकार सिर्फ हिंदुओं को है, यह उनकी विभाजनकारी और सांप्रदायिक राजनीति को दर्शाता है।
महाकुंभ में केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद अव्यवस्था और कुप्रबंधन की घटनाएँ सामने आ रही हैं। आग लगने, भगदड़ मचने और भीड़ प्रबंधन की विफलता के कारण कई श्रद्धालुओं की जान जा चुकी है। रेलवे प्लेटफॉर्मों पर भीड़ के कारण लोग कुचले जा रहे हैं, प्रशासन की बदइंतज़ामी के चलते कई परिवार अपनों से बिछड़ चुके हैं। मेरे हुए लोगों की लाशों की तलाश में लोग इधर उधर भटक रहे हैं। खोया पाया केंद्र में लोग अपने परिजनों की तलाश में कई दिनों से चकर लगा रहे हैं।
सरकार मौतों के सही आंकड़े छुपा रही है। जब विपक्ष इस बारे में सवाल पूछता है, तो सरकार जवाब देने से बचती है। सोशल मीडिया और लोकल लोगों के माध्यम से ही कुछ हद तक वास्तविक आंकड़े सामने आ रहे हैं, लेकिन सरकार उन पर भी रोक लगाने की कोशिश कर रही है।
बाबूलाल मरांडी इस मुद्दे पर सरकार से कोई सवाल नहीं पूछते। वे महाकुंभ के श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं पर ध्यान देने के बजाय, राजनीतिक फायदे के लिए झारखंड के मंत्रियों को निशाना बना रहे हैं।
अगर किसी भी धार्मिक आयोजन में सरकार की लापरवाही से लोगों की जान जाती है, तो यह केवल उस धर्म विशेष का मुद्दा नहीं होता, बल्कि पूरे देश का मुद्दा होता है। श्रद्धालु किसी भी धर्म के हों, वे इस देश के नागरिक हैं, और उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। यदि किसी आयोजन में कुप्रबंधन के कारण मौतें होती हैं, तो उस पर सवाल उठाना हर नागरिक का हक़ है।
लेकिन बाबूलाल मरांडी जैसे नेता इस विषय पर बात करने की बजाय, इसे हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बनाकर जनता का ध्यान भटकाना चाहते हैं। उनका इरादा केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना है, ताकि असली मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाया जा सके।
बाबूलाल मरांडी के बयान यह दर्शाते हैं कि वे धर्म को राजनीति का हथियार बना रहे हैं। वे जनता की मूलभूत समस्याओं, जैसे कि बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार पर बोलने के बजाय, धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं। यह मानसिकता लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के खिलाफ है।
झारखंड के मंत्री हफीजुल हसन और इरफान अंसारी ने महाकुंभ में हुई अव्यवस्था और मौतों को लेकर जो सवाल उठाए हैं, वे पूरी तरह जायज़ हैं। कुम्भ के भाकड़दड़ में इन मंत्रियों के क्षेत्र के भी नागरिक कुप्रबंधन के शिकार हुए हैं। झारखण्ड सरकर के मंत्री होने के नाते इन मंत्रियों सवाल उठाना ज़ायज़ है। सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए, न कि सवाल उठाने वालों को बदनाम करने का प्रयास करना चाहिए।
मेरा मानना है की बाबूलाल मरांडी का बयान उनकी संकीर्ण सोच को उजागर करता है। महाकुंभ केवल हिंदुओं का नहीं, बल्कि पूरे देश का आयोजन है। अगर इस आयोजन में कुप्रबंधन के कारण लोगों की मौत हो रही है, तो सरकार से सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है।
बाबूलाल मरांडी को चाहिए कि वे महाकुंभ में हुई अव्यवस्था पर सरकार से जवाब मांगें, न कि जनता को गुमराह करने और सांप्रदायिक विभाजन बढ़ाने का काम करें। देश के हर नागरिक को मिलकर उन नेताओं को जवाब देना चाहिए, जो धार्मिक आयोजनों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक फायदे के लिए करते हैं।
